उत्तरकाशी टनल से निकलने के बाद मज़दूरों ने क्या-क्या बताया
हम सभी मज़दूर भाई, 18 दिन तक टनल में फंसे थे लेकिन उन्हें एक भी दिन एहसास नहीं हुआ कि कोई कमज़ोरी या घबराहट महसूस हो रही हो क्योंकि 41 लोग थे जो अलग-अलग राज्यों से थे.
उन्होंने कहा, “हम सब भाई की तरह रहते थे और किसी को भी कोई दिक़्क़त होती थी तो मदद करते थे. खाना आता था तो हम सब मिल-जुलकर एक साथ बैठकर खाते थे. रात में खाना खाने के बाद मैं अपने लोगों से कहता था कि चलो टहलते हैं क्योंकि टनल के अंदर ढाई किलोमीटर की लंबाई थी.”
“सुबह के समय हम बंदों से कहते थे कि हम बस खा-पी रहे हैं तो थोड़ी मॉर्निग वॉक और योगा भी करना चाहिए. हम शुक्रिया अदा करना चाहते हैं उत्तराखंड सरकार का जिसने हमारे साथ इतना अच्छा व्यवहार किया. माननीय मुख्यमंत्री धामी साहब हमसे बराबर संपर्क में रहते थे. उनका भी बहुत शुक्रिया.”
उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर के एक अन्य मज़दूर अखिलेश ने कहा कि टनल के अंदर खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती थी, और उनका हालचाल लगातार लिया जाता रहता था. हम लोग ख़ुश हैं लेकिन हमसे ज़्यादा बाहर वाले भी ख़ुश हैं.
“शुरुआत में मोबाइल की बैटरी टाइम देखने के लिए बचाकर रखते थे लेकिन फिर कंपनी वालों ने मोबाइल और चार्जर उपलब्ध कराया जिसके बाद अच्छा लगने लगा और टाइम का पता चल जाता था. फिर मनोरंजन भी करने लगे और अच्छा लगने लगा.”
बिहार के छपरा से एक अन्य मज़दूर सोनू कुमार साहा ने बताया कि ‘एक समय जब हमें टनल में ऊब होने लगी तो हमारी परिजनों से बातचीत कराने की व्यवस्था की गई. जिससे हमारा मन हलका रहता था.’
“हम लोग एकसाथ एक परिवार के जैसे रहते थे. हमारे सीनियर साथियों ने हमारी बहुत हौसला अफ़ज़ाई की. एकजुट रहे और साथ खाना खाते थे. एनडीआरएफ़ के जवान जब अंदर घुसे तो हमारी जान में जान आई.”
मंगलवार को मज़दूरों को सुरंग से निकालते समय भी वो और पुष्कर सिंह धामी वहां मौजूद थे.


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